पहली किरणों को
प्राची में उठी पहली किरणों को घर-आँगन में आने दो। संदेहों, संशयों, द्वंद्वों, उद्वेगों से परे, अतिरेकों, रोकों, टोकों के पार, माटी की प्रथम अनुभूति और आसमान के नील रंग-धर्म से जुड़ भोली, उन्मुक्त हवा के संग, उजालों की कथा-प्रथा को खुले मन से, प्रसन्न चित्त से मन के कोने-कोने में बसने दो। प्रभात की विभा में खिलते हैं बड़े सौन्दर्य! जैसे हरे, हर्षित, चौड़े पत्रदलों के साथ, पतली, कोमल टहनियों पर टिके श्वेत प्रतिज्ञाओं से सज्जित, गुलाबी प्रेम में मज्जित, आत्मा की आभा से जगे हुए विस्तृत, विस्मित, भोर-विभोर कमल! -सतीश June 1, 2022. पटना