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पहली किरणों को

प्राची में उठी पहली किरणों को घर-आँगन में आने दो।  संदेहों, संशयों, द्वंद्वों, उद्वेगों से परे, अतिरेकों, रोकों, टोकों के पार, माटी की प्रथम अनुभूति और  आसमान के नील रंग-धर्म से जुड़ भोली, उन्मुक्त हवा के संग,  उजालों की कथा-प्रथा को  खुले मन से, प्रसन्न चित्त से मन के कोने-कोने में बसने दो।  प्रभात की विभा में  खिलते हैं बड़े सौन्दर्य!  जैसे हरे, हर्षित, चौड़े पत्रदलों के साथ, पतली, कोमल टहनियों पर टिके  श्वेत प्रतिज्ञाओं से सज्जित, गुलाबी प्रेम में मज्जित,  आत्मा की आभा से जगे हुए विस्तृत, विस्मित, भोर-विभोर कमल!  -सतीश  June 1, 2022.  पटना

श्रीकृष्ण

मोहन, तुमने जब राधा को  सस्नेह कहा - “आ राधा”, राधा “आराधना” , “आराध्या” हो गई! - तुम्हारे प्रेम-उपसर्ग को पाकर, तुम्हारी प्रेम-संधि में समाहित होकर, तुम्हारे प्रेम-समास में सम्मिलित होकर!  मधुसूदन, तुमने युधिष्ठिर को “सत्य” बनाया, तुमने अर्जुन को “कर्म” बनाया; और, यों,  तुमने “कर्म” को “सत्य” का अनुज बनाया  और “सत्य” को “कर्म” के प्रति उत्तरदायी बनाया!  श्रीकृष्ण, तुमने कालियदह में व्याल-मर्दन के लिए बाँसुरी बजायी, तुमने कालियदह को कर्म दिया, तुमने वृंदावन में गोपियों के लिए बाँसुरी बजायी, तुमने वृंदावन को प्रेम दिया, यों, तुमने कर्म से प्रेम की यात्रा पूरी की!  सुदर्शन, अपने “चक्र” की आभा में, अपने कर्म के दर्शन में दमक कर, तुम दर्शनीय-सुदर्शनीय हो गये! तुम आराध्य-अर्घ्य हो गये!  सतीश August 11, 2020  (जन्माष्टमी) 

प्रकृति को याद है

राग-अनुराग समेटते-समेटते रात बीती, यादों में अटकी चाँदनी की आहटें, आकाश के शरीर पर चपल चाँद की सस्मित सरसराहटें, कुछ साँस-धड़कनें, भाव-भंगिमाएँ, हलचल-हरकतें- सुबह में प्रकृति को याद है, अब भी, रात की बातें!  बातें,  जो क्षितिज को स्वर्ण-आभा पहनातीं, प्राची को प्रेम-स्पन्दन से भरतीं, ताजगी के तारों को मुखरित करतीं, फिर, तिरछी-सीधी किरणें हवाओं से टकरातीं, फुदकती, फहरती, फैलती, उष्णता उड़ेलतीं!  सुबह में प्रकृति को याद है रात की बातें !  बातें,  जो कोपलों को उकसातीं तनाओं को प्रेमिल परत से ढँकतीं, हरी-हरी पत्तियों की पतली-पतली  धमनियों को प्रेम-लकीरें सौंपतीं, कलियों के ह्रदय-आवरण खोलतीं, कोमल पँखुड़ियों में लज्जा भरतीं, फूलों के मन को उमगातीं, पराग-कणों को राग-विभोर करतीं,  हवाओं को सुंदर मर्म से हिलातीं-डुलातीं! लाल-लाल चेहरा लिए नभ की नसों में दौड़ती खगों की चहचहाहटें! सौंदर्य-सुहाग से दमकती, लोल-ललित, मुदित, विस्मित होती सुबह! सुबह में प्रकृति को याद है, अब भी, रात की बातें!     - सतीश Oct 30, 2020.         ...

श्रीराम

  अयोध्या के रग-रग में  जीवन-सर्ग तुम्हारा बसता है, अयोध्या के रंगों-रेशों में उत्सर्ग तुम्हारा बसता है, भारत-भूमि के कण-कण में मन-प्राण तुम्हारा रहता है।  तेरे कर्म-धर्म के शिल्पों में संस्कार तुम्हारा रहता है, तेरे रूप-स्वरूप की छाया में  संस्कृति हमारी पलती है। तेरे धनुष की डोरी पर सृजन-कृति-प्रकृति ठहरती है, तेरे वाणों की भाषा में मर्यादा ऊपर चढ़ती है!  माता सीता की जीवन-छाया में शील-मर्यादा तेरी बढ़ती है, शबरी के जूठे बेरों में प्रेम-मान तुम्हारा बसता है, सुग्रीव के व्यवहारों में मित्र-भाव तुम्हारा रहता है, संबंधों की ग्रीवा तनी रहे भाव ऐसा जगता है!  संकटमोचन की लाई जड़ी-बूटी में अमिय-अजर शक्ति तुम्हारी बस्ती है, रामेश्वरम् के संकल्प-छंद तेरे बोलते है, पत्थर-पत्थर के पावन प्लावन में आशीष तुम्हारे तैरते हैं!  तेरे चरणों की आकृति में भव-धाम हमारा बसता है, तेरे चरणों के रज-कण में  परित्राण हमारा रहता है, तेरे नाम के उच्चारण में अग-जग निनादित होता है! सतीश  ⁃ August 4, 2020

भोर को भोर होने दो

भोर को भोर होने दो, भोर को भोर रहने दो, भोर को भोर कहने दो, भोर भोर है, भोर केवल भोर है!  वह कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई आक्रोश नहीं, स्वयं सृष्टि की एक सकर्मक क्रिया है। भोर किसी अँधेरे का प्रत्यय नहीं, किसी अपर व्यक्तित्व का उपसर्ग नहीं, प्रकृति का एक अस्तित्व-खंड है, एक सात्विक, सजग, सोद्देश्य अस्तित्व!  भोर है जीवन का उज्ज्वल ज्ञान-खंड, एक सर्वव्यापी ज्ञान, एक विशद ध्येय,  जीवन का सुंदर सर्ग, एक महान् उत्सर्ग! भोर को भोर होने दो, भोर को भोर रहने दो, भोर को भोर कहने दो, भोर भोर है, भोर केवल भोर है!  ⁃ सतीश  May 18, 2022.

महादेव

शिव हैं काल, अकाल सकल! शिव हैं सत्य, शिव हैं सुंदर, शिवत्व सृष्टि का अमिय अवयव!  सृष्टि के संजीवन तत्व तुम हो, विधान, नियति, समग्र लीला तुम हो! सृजन, शक्ति, संहार तुम हो,  भोर, शाम, याम, सार, संसार तुम हो,  कल्प, संकल्प, अनंत युग-युगों की परिधि, सम-विषम समाधान तुम हो,  हे महादेव, तुम हो जय, अजेय, अपरिमेय!  नमन तुम्हें, बार-बार नमन तुम्हें !  माथे पर अर्द्धचंद्र का निष्काम कर्म लिए, देह पर सर्पों की विविध कलाओं को थामे तुम अविरल जीवन-शक्ति की अमर्त्य जटा!  तेरे त्रिशूल पर ठहरे हैं, जग के  असत्-सत्,  विष-अमृत, जर-अजर!  तुम पुनीत मानवता के शीर्ष रव, तन और मन के पूर्ण मिलन से निःसृत ध्वनि, ताल, नाद, लय में मज्जित  तुम निराकार-साकार तांडव!  जीवन के अनन्य रस्म तुम, मुक्ति-संहिता के पूर्ण भस्म तुम, साधना-आराधना, प्रवृत्ति-निवृत्ति के  भोले भावों से भरे ओम तुम,  हे महादेव, तुम हो जय, अजेय, अपरिमेय!  नमन तुम्हें, बार-बार नमन तुम्हें !  ⁃ सतीश  May 16, 2022 Civic Center, San Francisco.

सच्चा स्वार्थ

पूछता रहता हूँ अपने आप से- सच्चा स्वार्थ क्या है?  आते-जाते दिन-रात, लाभ-हानि के छोटे-बड़े अंकगणित में अंकित-टंकित रहना? उनसे स्वयं को, दूसरों को  रेखांकित करते रहना?  तौल-तराज़ू को बनाते रहना? उसपर चढ़ते-उतरने रहना?  या, औरों के प्रति सकारात्मक, गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ होना?  ताकि कभी “अचानक”, अनायास , अच्छे होने-दिखने की बेतुकी  आवश्यकता नहीं हो?  और, “स्व” को आँकना, उसके सही अर्थों को पहचानना, स्वत्व की सीमाओं को  सतत् फैलाते रहना? जीवन के बड़े उद्देश्यों से  स्व को जोड़ देना, जोड़ते रहना ?  सच्चे “स्व” का सच्चा “अर्थ” क्या है?  - सतीश  May 15, 2022. 

प्रकृति-सत्ता

शिखरों को जाने-अनजाने, अपने बोध-अबोध में  मौन बने रहने की प्रकृति  मिली होती है! लहरों को, लेकिन, चट्टानों से  टकराने की लत लगी रहती है, इसी प्रक्रम में उन्हें आने-जाने, ऊपर-नीचे होने, उठने-गिरने की  आदत मिली होती है! लहरें जब-जब चट्टानों से टकराती हैं, सुंदरतम लगती हैं, वे अपने अस्तित्व का औचित्य बताया करती हैं!  शीर्ष शक्तियों को ज्ञात रहे कि पर्वतों के सुंदरतम फैलावों में  गहरी घाटियाँ, दूर-दूर तक फैली  कंदराएँ बसी होती हैं, ऊँचे, पवित्रतम कुंड बसे होते हैं!  ⁃ सतीश  May 15, 2022. 

व्यापक बीमारी

हर भटकी प्रवृत्ति, स्वार्थरंजित अभिव्यक्ति  प्रजातंत्र में है एक मत, विचार और दृष्टि!  सच और सही को नकारते रहना यंत्र-तंत्र की निपुण, चतुर शैली, प्रजातंत्र की आदत-सी हो गई है! हम जो हैं, वैसा लगे नहीं? वैसा दिखे नहीं?  “स्व” को स्वीकार नहीं करना, आत्म-हनन को विशेष बोध मानना व्यक्ति से व्यवस्था तक के रग-रग में धँसी  एक भयानक त्रासदी है, व्यापक बीमारी है! ⁃ सतीश  May 14, 2022.

अभिव्यक्ति की आधुनिक स्वतंत्रता

आज हमारी सोच, सोच की स्वतंत्रता इतनी आधुनिक है कि आतंकवाद में हम आदर्श ढूँढते हैं, हिंसा में “मानवता” की कहानी पाते हैं, देश-मर्यादा को सजगता की मानहानि बताते हैं, राष्ट्रीय होने से परहेज़ करते हैं, अन्तर्राष्ट्रीयता की अमोघ चूर्णशक्ति में, उसके अनियंत्रित व्यसन-सेवन में विश्व-हित का समस्त समाधान देखते हैं, “सहनशीलता” के विराट, धन्य छंद गढ़ते हैं!  दूसरी ओर, आये दिन, “समता”,  “स्वतंत्रता” और “न्याय” की  श्रेष्ठ भंगिमाओं, उच्च घोषणाओं के बीच  किराये पर आये तर्कों के निष्ठुर प्यादे  जगह-जगह मुँह बाये खड़े होते हैं नोंच-चोंथ के लिए, भोग-उपभोग के लिए; सच से उनका सरोकार नहीं होता, सही होने की चिंता नहीं होती, वाद की अतिशय ग्रंथि उन्हें ग्रसित रखती है; अपनी विभिन्न, व्यापक मुद्राओं में  विशुद्ध विकृतियाँ मनोहर कृतियाँ बन कर आती हैं, शिक्षित, विकसित, सभ्य, उच्च, उर्वर मस्तिष्क की  निष्ठुर क्रिया-कलाओं की ! वे इतने स्वतंत्र, इतने उन्मुक्त होते हैं कि विरोध के छोटे तर्क भी  उनकी सहनशीलता को बर्दाश्त नहीं होते, जाने-पहचाने सच पर बनी कला की प्रस्तुति भी उन्ह...

ऐकिक

धर्म की प्रकृति, प्रकृति का धर्म, सौंदर्य की धर्म-प्रकृति ! -           मूल, मूल्यों के संधान में मग्न, मन के गहरे अवगाहन में लीन, गूढ़, स्वच्छ आत्म-बोध में लय  नैसर्गिक सत्ताएँ - एकबद्ध, एकात्म, ऐकिक!    - सतीश  May 2/ May 5, 2022

धरती-बोध

ऊँचाइयाँ चाहे जितनी भी भली हों, आँखों में धरती होनी चाहिए; उड़ानें चाहे जितनी भी बड़ी हों, उनके उद्देश्यों में धरा धरी होनी चाहिए! सूरज हो, या चाँद उनकी किरणों को  अपने स्वत्व से अलग होकर  दूर आना पड़ता है, धरती तक पहुँचना पड़ता है, तभी उनकी ताक लोगों को होती है, तभी वे नमस्य होते हैं! अन्यथा, बहुतेरे बड़े अस्तित्व  आकाशगंगा में अदृश्य रह जाते हैं! उनकी प्रतिभा वसुधा को छूती नहीं, इसलिए, वे चाहे नहीं जाते, खोजे नहीं चाहते, आराध्य नहीं हो पाते!  ⁃ May 7, 2022.