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अलास्का की शाम

जाते-जाते सूरज की किरणें  पर्वत-शरीर पर निर्विकार चित्त से लेटी हैं; भोले भावों से सिहर विस्मय से भरे स्मित मन-तरंगों पर चढ़ के विनोदपूर्ण अल्हड़ ओठों से वे  पर्वत-भालों को बार-बार हैं चूम रहीं ! धीरे-धीरे किरणों का चुम्बन धीर हुआ जाता है, जैसे मन की गहरी आँधी भी सोच-विचार कर, सँभल-सँभल कर या, आश्वस्त, निश्चिंत होकर  अधीर अधरों तक आती हो!  ग्लेशियर से होकर, नीचे तल पर जल की निर्मल मन-धारा शांतमना बहती जाती है, उसके ह्रदय की स्वच्छ ध्वनि  स्पष्ट सुनाई पड़ती है!  ⁃ सतीश  Dec 31, 2022. 

पत्थर की भाषा

सचमुच ,  पत्थर   भी   हैं   बोल   रहे सृष्टि   की   अद्भुत   भाषा !  सुंदर   संयोजन ,  निपुण   नियोजन , जीवन - अर्थों   से   भरा   अवलोकन  ! आपस   में   मिलकर   पत्थर   भी कुछ   शील - चित्र   गढ़   लेते   हैं , चुप   रहकर   भी   कुछ   कह   देते , कहकर   भी   चुप   रह   जाते   हैं !  बड़े   निश्चिंत ,  सरल   भाव   से   वे   विविध   आकारों ,  आकृतियों   को   थामे सकलता   के   स्वरूप और   व्यक्तित्व   की पूर्णता ,  चेतनता   सतत्   जताते   हैं , भिन्न - भिन्न   भंगिमाओं   को   धारे जग - व्यवहार   सजग   बनाते   हैं !  यही  है  प्रकृति   का   शाश्वत   नियमन , यही   सहज   गति   और   प्रेरक   संवेदन ! सतीश   Dec 28, 2022 

ऐ बरखा रानी!

तुम भीग-भीग कर बरस गयी, या, बरस-बरस कर भीग गयी? ऐ बरखा रानी!  तुम बूँद-बूँद बन छहर गयी, या, छहर-छहर कर बूँद-बूँद हुई?  ऐ बरखा रानी! तुम मेघों में बस कर नेह-गेह बनी, या नेहों से भर कर छलक गयी?  ऐ बरखा रानी!  मेड़ों की बेचैन पुकारों पर आकुल होकर तुम उतर गयी? किन मधु-सिक्त भावों से सिहर-सिहर कर तुम आज अवतरित हुई?  ऐ बरखा रानी!  आसमान से धरती तक  कैसे-कैसे तुम छा गयी!  अनंत मनों, मुकुटों, मुँडेरों पर तुम निश्चल विराज रही!  ऐ बरखा रानी !  -सतीश  Dec 27, 2022. 

वर्षों की बातें

वर्षों की बातें कहानी-सी बन गयीं,  किसी रग से आरम्भ हुईं, किसी रेशे में बह गईं; वर्षों की बातें प्रकृति-सी हो गयीं, हर सुबह जग गयीं हर शाम ढल गयीं; वर्षों की बातें नदियों-सी बह गयीं, न जाने कितने पर्वतों के शीर्षों से होकर  किन-किन वादियों में बस गयीं, किन-किन घाटियों में रम गयीं!  वर्षों की बातें अपने आप में अथ हो गयीं, स्वयं ही अंत, स्वयं अनंत हो गयीं!  वर्षों की बातें ! - सतीश  Dec 25, 2022. 

वह

वह एक स्वप्न थी, कुछ ढँकी, कुछ खुली-सी! वह आसमान को ताक रही थी, शून्य को खोजती, स्वयं एक अपरिमित शून्य-सी। अपने सिर को पुस्तकों पर टिकाये थी, एक सभ्यता-सी, सभ्यता बनने की प्रक्रिया, प्रयास-सी। वह सोच रही थी, प्रकृति-सी, एक सुंदर कृति-सी। वह लीन-विलीन थी, एक अनजाने अवयव-सी, एक महती खोज-सी। वह किसी ध्यान में थी, कला की सुंदर बुनावट लिए एक परम ज्ञान-सी, या चरम भक्ति-सी!  -सतीश  27 June, 2022. 

भारत-धर्म

शीत हो या वसंत, ग्रीष्म हो या हेमंत,       शौर्य का धर्म जगा रहे,    शील-संस्कृति से सनी    कर्म की ऊर्जा बनी रहे!  यही है संकल्प, यही गर्व हमारा, यही है पुनीत विजय-पर्व हमारा, यही भारत, यही भारत-धर्म हमारा!  #विजय_दिवस #विजयदिवस #India #भारत

कुछ सुंदर बंध

जीवन में प्रसन्नता के कुछ सुंदर बंध भी हैं, आशा के कुछ स्वर, कुछ भोले संबंध भी हैं, कुछ उज्ज्वल कर्म, कुछ सकारात्मक तथ्य भी हैं, उन्नत   सफलताओं   के  ऊँचे,  उत्कृष्ट   गंतव्य ,  आदर्शों   की   छुअन ,  शालीनता   के   सौंदर्य   भी   हैं   ।   अच्छी है वह स्थिति, वह मनःस्थिति जब हम  कहानियों को उन्हें पढ़ने दें, लिखने दें  कविताओं को उन्हें गाने दें, सुनने, विचारने दें, कलाओं को उन्हें पहचानने दें, गढ़ने दें!  ⁃ सतीश  Dec 13, 2022. 

पूजा

छोटे-से-छोटे समय की छोटी-सी छोटी पूजा  अपने आप में सम्पूर्ण हो सकती है, सात्विक, श्रेष्ठ और सुंदरतम भी।  सोचता हूँ, पूजा इतनी सहज हो जाये कि  हर पूजा साँस हो जाये, और, हर साँस पूजा हो जाये! - प्रकृति से, समिधा, प्रक्रिया, अन्तर्मन से। -सतीश  Dec 11, 2022. 

सूर्य

भोर   की   पहली   किरण   से संध्या   की   अंतिम   किरण   तक   सूर्य   जीवन - रण   में   संलग्न   है , पूरी   नीरवता   के   साथ !  आसमान   के   नीले - नीले   सत्व   को   जगातीं , उसके   अंतस्तल   की   ज्योति   को   सुलगातीं ,  शीत   हवाओं   को   उष्णता   का   मर्म   देतीं , अन्यमनस्क   जगत् - गाँठों   को   खोलतीं , सुंदर   भावों   को   सतत्   थपथपातीं ,  कुछ   उकसातीं , विस्मयों ,  उत्सुकताओं   को   नये   विन्यासों   से   भरतीं , प्रकृति   को   जीवन   के   प्राण   सौंपतीं , अपूर्णताओं   के   व्यक्तित्वों   में   पूर्णता   का   आभास   घोलतीं , कथित - अकथित , पठित - अपठित ,  दृश्य - अदृश्य   मूल्यों   के   प्रसंगों   के   संग   खेलतीं , अथ   से  ...

साँझ

वो   साँझ क्यों   ढली   थी ? वो   तो   मनुष्यता - सी   स्पष्ट   थी ! सच्चे   प्यार - सी   भली   थी !  धरती   के   ओर - छोर   पर , क्षितिज   के   कोर - पोर   पर वो   चुपचाप   क्यों   खड़ी   थी ? वृहत   संदर्भों   को   ढूँढती   जीवन - मेड़ों   पर   अड़ी   थी ?  या   क्षणों   की   मर्यादाओं   को   टोहती कर्म - पथ   में   यहाँ - वहाँ   मिली   कुछ   यादों   में   अटकी   पड़ी   थी ?  फिर ,  वर्षा   की   हल्की ,  छरहरी   बूँदें अचानक   ही   आ   गयीं !   नयी जीवन-अगुआई में फिर रात क्यों नम हुई?  क्यों सहज भीग गई? शांतमना क्यों बह गई, चतुर्दिक क्यों फैल गई? लोक से अलोक तक  चाँद क्या तक रहा था?  बादलों की टोका-टोकी, तीखे शीत की तेज धार, घने कालेपन के बीचों-बीच भी  वह क्यों सलोना, शीतल, शालीन बना था?  ⁃ सतीश...

एक शाम

बहुत   दिनों   के   बाद पहले   की   तरह     मैं   घर   वापस   लौट   रहा   था। बहुत - बहुत   दिनों   के   बाद मैं   बादलों   से   बहुत - बहुत   ऊपर   था ! पश्चिम   में ,  अपने   प्रारब्ध - प्रबोध   से सूरज   उतरने   की   प्रकिया   में   था  -  अमाप - अमंद -  अव्याख्येय   धुन   से   सुलगित , गत   से   अनागत   तक   फैले   हुए संचित ,  समिधापूर्ण ,  सम्पूर्ण   तपों   की   समन्वित ,  समवेत ,  शुभ्र ,  शीलवंत   अभिव्यक्ति !  उसकी   कर्मस्थ   कांति , ललित ,  लोहित   कांति जीवन   के   अस्ताचल   और   उदयाचल   को एकजुट   बाँधने   की   कोशिशों   में   तने   हुए   आकाश   की   मेहनतकश   नसों   के   पोर - पोर   में   बह   रही   थी ;...