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बचपना

एक दोस्त ने कहा  कि हो सके तो, बचपना में झाँक कर देखो!   तो, स्मृति-विस्मृति की तहों से  गुजरते हुए लगा कि  बचपना सही अर्थों में बड़ी उद्यमी होती है; वह पग-मग उठाने से हिचकती नहीं, डरती नहीं; वह स्वप्नों के साँचे नहीं खोजती, भटकनों की तालिका नहीं रखती, ख़ेमों-खाँचों-खंडों के तराज़ू पर चढ़ती-उतरती नहीं रहती; वह हर क्षण, हर याम  नये-नये आयामों में अनायास  अपने विन्यास को पाती रहती है!  बचपना चेतना के स्पंदनों,स्वरों, संगीतों को  खुल कर जीती है, वह आग्रह-दुराग्रह के व्यूह में नहीं रहती, उसे कला या कविता बनने, बनाने की  चिंता नहीं होती,  वह जीवन में रहती है, जीवन को जीती है, जीवन को हँसती-रोती, गाती-गुनगुनाती है, वह जीवन होती है।  अच्छा हो, हम अमिय औषधि “बचपना” की दो-चार घूँट हर दिन, हर क्षण पीते रहें; मन के सहज, सरल  विंदुओं, वृत्तों, विन्यासों को  पाते, टटोलते, जीते रहें!  ⁃ सतीश  20 Nov, 2021. 

Imperfection

Let us Live the life we have, Don’t waste it in  making it too perfect, Don’t waste it in  Expecting the perfection From others,  Simetimes even from yourself! Imperfection is a big enjoyment!  ⁃ Satish Oct 30, 2021. 

पत्थर

जिस पत्थर पर हमने माथा टेका, वह पत्थर पत्थर ही निकला! जिन भाव-विचार-तर्कों को लेकर  हमने ऊँचे-ऊँचे शोर मचाये,  अधिकतर, वे भ्रामक, निरर्थक निकले; जिन आसों पर हमने अपनी साँसें टाँगी, वे आसें उड़ना, सँभलना भूल गईं। जिस दर्पण में हमने अपनी सूरत देखी, वह दर्पण बेचारा, टूटा निकला; जिस छाती में हमने अपनी धड़कन रखी, वह छाती निज चेतना भूल गई!     सतीश  Dec 30, 2021. 

कह दो कहने वालों से

कह दो कहने वालों से  कि जानता हूँ  स्वर्ग आज आहत होकर  धरती पर आया है।  पर, देता हूँ उनको साधु-मन, देता हूँ उनको प्रेम-वचन,  देता हूँ उनको शुद्ध मनन  कि जो विशेष नहीं, संभव है, वे भी अशेष हैं,  जो विशेषज्ञ नहीं,  हो सकता है, वे हेय नहीं,  जो विशेषज्ञ नहीं, संभव है, उनमें भी कुछ ज्ञेय हो, और, वे भी ज्ञेय हों!  कह दो कहने वालों से!  -सतीश  Dec 30, 2021

निराशा की कला

  कला, कविता-कहानी, दर्शन में निराशा का अतिशय प्रक्षेपण, दुराशा की दुकानदारी,  कला-रूपों से उनका घालमेल  सामाजिक-मानसिक अतिशयता नहीं?  अपराध नहीं?   कला में  विसंगति, विरोधाभास के अनुपात जीवन में उनकी उपस्थिति से अधिक क्यों हों?  सकारात्मकता को परखना,  बटोरना, जगाना, जीवन-निर्माण की गति, विधा को  मुखर  करना, प्रेरित करना,  जीवन में सुख के पलों-पक्षों को रखना,  उन्हें खोजना, उनसे संवाद करना असंगति है? अकला-बोध है?  -सतीश  Dec 30, 2021

तम की छाती पर

हम एक हल्की  दीप-ज्वाला ही हो जाते, अँधेरे से लड़ तो लेते  -  उजला-पीला-लाल होकर, कभी एक छोटी रेखा में उठकर, कभी दृढ़ होकर, कभी हिलडुल कर, कभी सीधे, कभी तिरछे होकर, कभी शांत, निश्चिंत भाव की उष्णता लिए, कभी तीक्ष्ण तेवर से लपलपाकर, कभी झिलमिला कर ही सही,  कभी तिलमिला कर ही सही, तम की छाती पर तन तो जाते!  ⁃ सतीश  Oct 5, 2021. 

एक शहर

स्वप्नों की रंग-भरी उड़ानों पर  महल ऊँचे से ऊँचे होते जाते हैं, शहर-नगर बसता जाता है, सभ्यता बनने-बढ़ने-बदलने  की आस में रहती है, भीड़, रोर, जमाव, ठहराव -  सब अपनी-अपनी लय में आते-जाते रहते हैं,  नदी चुपचाप बहती रहती है! परम्पराएँ-परिपाटियाँ  समय के अंतस्तल में ठहर कर  प्रशांत हो जाती हैं; जीवन की गति-विधा जब गहरी होती है, वह धीमी हो जाती है!  30 Nov, 2021 ,  One Raffles Quay, Singapore. 

पापा

जीवन के सौ-सहस्र गात हों, मूल, मूल्यों की असली सौग़ात हो, कर्म हो या धर्म, उलझन हो या सुलझन, इनके गीत जब मैं रचता-गाता हूँ, वे गीत आपके ही होते हैं!  पथ नहीं, सही पथ हो, मर्यादा की डोर छूटे, टूटे नहीं, प्रतिशोध की प्रवृत्ति-मनोवृत्ति  जीवन का, जीवन की मूल क्रिया का चरित्र नहीं हो,- इनसे बँध-बँध कर,  इनसे जुट-जुट कर, जब-जब जीवन के छोटे-बड़े पग मैं धरता हूँ, वे पग आपके ही होते हैं! जीवन में ‘जीवन’ प्रथम-प्रधान रहे, राहें छोटी या बड़ी हों, वे स्वप्नों से भरी-भरी हों,- इनसे जुड़कर कोई स्वप्न जब मैं बाँधता  हूँ, वे स्वप्न आपके ही होते हैं।  भाषा, बिम्ब, कला या जीवन हो, - वे सहज रहें, सरल रहें, सीधे चलें,  जब-जब इन भाव-विभवों के साथ मैं होता हूँ,  वे भाव आपके ही होते हैं!  -सतीश  20 Nov, 2021. 

सूर्य चिंतित क्यों है?

सोचता हूँ, पूछ लूँ ?  सूर्य किस चिंता में लीन है?  पता नहीं,  कहाँ, किस ओर विलीन है? जग के बड़े हेतु हैं खोज रहे, उन्नत उद्देश्य हैं पुकार रहे, पर, वह क्यों चुप, उदासीन है? भरी दोपहरी में वह कभी-कभी मद्धिम-सा रहता है, उसके तेवर मन्द-मन्द पड़े हैं, ज्वाला बुझी-बुझी लगती है! दोपहरी का सूरज  तीक्ष्ण होने से हिचकता नहीं; भले ही उसके आराधक भी  बंद कमरों, अंध गुफाओं में लुक जायें, वह कर्म-पथ के कठोर दायित्वों से अपने आप को अलग नहीं करता। स्वभावत:, कर नहीं सकता, कर भी नहीं पाता।  हो सकता है कि धरती की समझ सपाट, सरल और अधूरी हो, पर, संभवत:, जीवन की धुरी के समीप होकर  वह मिट्टी के बोध-मूल्यों से सनी हो, वास्तविकता से भरी हो!  ऐ सूर्य, तेरी ओज-तेज भरी किरणें  शौर्य-शीर्ष-प्रतिष्ठा के पहले ही  फीकी  हो रही हैं? क्या शाम अनजानी  धूर्त गति से  निकट आ रही है? ⁃ सतीश  Jan 16, 2022. 

प्रेम

प्रेम!  (चाहे व्यक्ति से हो, या कर्म, धर्म, समाज-राष्ट्र से) उसके होने का पहला अक्षर  अपने अंश के उत्सर्ग से बनता है ताकि वह संयुक्त हो सके, सम्पूर्ण, पूर्ण शब्द बन सके, सकल अनुभूति,  भावनाओं का देश, सुंदर जीवन-सर्ग बन सके।  सतीश  Jan 16, 2022. 

गिद्ध चारों ओर खड़े हैं!

गिद्ध चारों ओर खड़े हैं! हम अपनी आलोचना करने की शक्ति रखते हैं, अपनी कमियों को देखने की प्रवृत्ति रखते हैं; पर, वे तो सदैव भोज-भात में लगे हैं, छीना-झपटी, बंदर-बाँट में फँसे हैं, सत्ता के कलुषित आहार-व्यापार में पड़े हैं!  उनके दोषारोपण का ठौर नहीं, तुक नहीं, उन्हें विरोध की मर्यादा का ज्ञान नहीं,  विरोध के लिए विरोध करते रहना उनकी अचूक मान्यता है, यही उनकी नियत, यही नियति है!  ⁃ सतीश           Jan 8, 2022.

कर्म की पहचान

कर्म को नहीं पहचानना, धर्म की अवहेलना है!  कर्म कठिन हो सकते हैं, कठोर भी; सन्दर्भ की आवश्यकता  उसके होने का सबसे बड़ा अर्थ है, सबसे बड़ी सार्थकता; हमारे निर्णय कर्म-यज्ञ की पुनीत समिधा होते हैं!  निर्णय की मति-गति, विधा यज्ञ-ज्वाला की श्रेष्ठ, सकारात्मक शक्ति है। संशयों, प्रशंसाओं या आलोचनाओं का अतिशय आग्रह कर्म-चेतना को  व्यथित, पीड़ित, ग्रसित कर सकता है। कविता की आत्मा बोलती है कि कर्म-सत्व सदा बने रहें, व्यक्ति से देश तक,  देश से विश्व तक; वे उज्ज्वल और श्रेयस्कर रहें!  ⁃ सतीश             Jan 8, 2021. 

हिंदी

हिंदी सच कहूँ? तुम शरीर नहीं, आत्मा हो गई!  तेरे वर्ण, अक्षर, शब्द  से होकर  करूणा के कलेजे, वेदनाओं के सर्ग-सन्दर्भ, हँसी और दुख के तन-मन,  भावों के अपरिमित आयतन, प्रेम-घृणा की असंख्य परतों, आस-प्यास-साँस,  रास-लास-मधुमास,  रंग-तरंग, सकल उल्लास, राग-विराग, हास-परिहास, उद्वेग-द्वंद्व की पकड़-जकड़, मन-ज्ञान, आत्मा की बुदबुदाहट को मैंने समझना, नापना, भाँपना सीखा!  तुम कभी गुदगुदी, कभी कचोट, कभी चोट की अनुभूति, कभी प्रेरणा हो गई! पेट-पेशे, आहार-व्यापार की दिन-रात की  आवश्यकता, औपचारिकता से दूर तेरी उँगलियों को धरकर  पर्वतों पर चढ़ना-उतरना, फिसलना-सँभलना, सागर की परतों में पैठना-धँसना, धरती की धूल-धूम, बादलों की नियत और नियति, जीवन की रेत,  यहाँ-वहाँ उचित-अनुचित वर्षण को देखना-पहचानना सीखा! तुम जीवन का आरम्भ, फिर, आवश्यकता हो गई!  तेरी वर्तनी में मुक्त-उन्मुक्त, खुली भोर, साँझ के सिमटे मन, रात के चेहरे-चरित्र को  पढ़ना, उनसे होकर गुजरना सीखा! शरद-शीत की भाषा, हेमंत-वसंत की अभिव्यक्ति, ग्रीष्म-वर्षा की अमित, अतुलित पहचानों को  ...