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कविता का बनना, नहीं बनना

कविता का बनना, नहीं बनना  कविता के बनने की प्रकिया,  उसका बनते बनते रह जाना कविता है!  जीवन को पाना, कहीं जीवन का अटक जाना कविता है।  अपने आप को पा लेना,  या कभी नहीं पा पाना,  या पाते-पाते बहुत सारे भावों का छूट जाना कविता है।  अपने आप को ढूँढ़ना,  ढूँढने से हिचकना,  उस हिचक को पहचानना,  स्वयं से नेह-मोह, कभी विरोध,  कभी विद्रोह कविता है।  अपने छोटापन को देखना, उससे जूझना, उस यात्रा में  सफल या असफल होना कविता है!  जीवन की आवश्यक-अनावश्यक आपाधापी में कुछ चीजों का बचा रह जाना, बचे रहने का योग, संयोग  और साथ ही कुछ तत्वों का कहीं छूट जाना कविता है!  -सतीश  3 अगस्त/ 31 अगस्त 2024. 

तुम, भोर के विन्यास सी!

  तुम, भोर के विन्यास सी!  तुम एक फूल हो, फूल की सुंदरता भी हो, तुम एक जीवन-आयाम, जीवन की सकलता भी हो! तुम जीवन हो, जीवन की भाषाएँ भी हो, तल-अतल में छिपी-अनछिपी सुंदर आशाएँ भी हो!  मेरी नसों में तुम्हारे व्यक्तित्व का बल है, वहाँ तुम्हारी काया, कविता और कल्पना सकल है!  खड़ी हो, तनी हो, बैठी हो, झुकी हो, लेटी हो, लगता है, थिर-अथिर शाश्वत सृष्टि समेटी हो!  रोज़मर्रा की आवश्यकताओं, मकान-दुकान को  खोजता-जुटाता मैं एक पुरूष-याचक हूँ, तुम अपनी कृतियों से बँधी, उन्हें जुगाती,  भविष्य की तानों को पकड़ती, सँभालती, तानती  भाग्य हो, भविष्य हो, सम्पूर्ण भविष्य-सृजक हो!  लगता है, कहती हो-  मैं चर हूँ, अचर हूँ, सहचर हूँ, मैं जल हूँ, समुद्र हूँ, लघु-अलघु विस्मृत-अविस्मृत लहर हूँ!  लगता है, कहती हो - मैं लीक हूँ, नवेली लकीर भी हूँ, कभी पास आये, कभी फिसल जाये, कभी छूट जाये, कभी मिल जाये, प्रकृति का वह सीधा-सहज शरीर हूँ!  लगता है, कहती हो -  पत्थरों पर मैं बिछी हूँ कल्पना की भंगिमा सी,  पूरब के चेहरे पर विभोर भोर के विन्यास-सी, विस्तार...

कैसे खुलती है कली?

कैसे खुलती है कली?  कैसे  खुलती है कली कैसे पसरता है वह ह्रदय?  मन की किसी ऐंठन से या तन के मधुर विन्यास से?  पंखुड़ियों के आत्मिक आंदोलन से?  या उनके सुघड़ बंधों के सहज संबंधों से?  परत-परत में निरत  परिचित-अपरिचित हास-परिहास से?  या तप्त भावनाओं के विह्वल उजास से?  कैसे  खुलती है कली?  कैसे पसरता है वह ह्रदय?  ⁃ सतीश  26 जुलाई, 2024

व्यवस्था का अट्टहास

 व्यवस्था का अट्टहास  कभी मैं मरता हूँ, कभी तुम मरते हो, कभी वे मरते हैं!  पर, व्यवस्था  हमेशा जीती है, वही की वही बनी रहती है, वो हमेशा निमग्न रहती है,  राक्षसी अट्टहास में !  देश में किसी के मरने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता!  सारे दल, दलदल चिल्ला-चिल्ला कर यही कहते हैं!  ⁃ सतीश  28 जुलाई, 2024. 

गुरू और गुरूत्वाकर्षण

 गुरू और गुरूत्वाकर्षण  सात्विक गुरू का गुरुत्व, गुरुत्व का चेतन आकर्षण है जीवन का सबसे सहज, सबसे सुंदर, सबसे मोहक, सबसे पूर्ण गुरूत्वाकर्षण !  ⁃ सतीश   लॉस वेगस,  21 जुलाई, 2024, गुरू पूर्णिमा 

सर्प-नियति

सर्प-नियति लचीला होता है सर्पों का शरीर!  मोहक होती है उनकी फ़न-प्रवृत्ति, जहरीली कलाओं से मत्त उनकी नियति!  हम उसे देखकर भी नहीं देख पाते,  हम विशिष्ट, शिष्ट, अवशिष्ट होने की धुन में हैं!  ⁃ सतीश  अगस्त 8, 2024. 

Writer

“Writer”!  Sometimes, I wonder Having Intellect is duplicity ?  Or duplicity is so full of intellect?  ⁃ Satish August 5, 2024. 

नियति और सौभाग्य

नियति और सौभाग्य  बहुत बार लगता है - उलझन है हमारी नियति!  पर, यह भी सच है कि सुलझना है जीवन-पथ का कर्तव्य, और एक अन्तर्निहित सौभाग्य!  ⁃ सतीश  अगस्त 10, 2024. 

वक्ष

वक्ष वह ह्रदय-पुट, वह मर्म-गुच्छ, वह क्षीर-भव! वह कल्प-संचय, वह कल्पना-गेह, वह भव्य पट, वह दिव्य अक्ष,  वह सुरभि-तल, वह सौंदर्य-पटल !  वह मनबद्ध, मानबद्ध, वह भावबद्ध, वह शीलबद्ध सा लगता है,  वह कुछ मदमाता, कुछ इठलाता, कुछ इतराता सा लगता है, वह शक्ति-पुंज की गहन गूँजों से भरा-भरा सा लगता है!  उसकी गठन में सुंदर तन का चंदन-गायन बसता है, मद-मोद, मदन-मादन, उत्तेजन-आवेशन बसता है; उसकी लय में मन-सावन का गर्जन-तर्जन बसता है, उसकी लय में छहर-फहर का मोहन-नर्तन रहता है, उसकी लय में ख़ुश मेघों का घर्षण-आलोड़न रहता है, उसकी लय में मधुर कसक का कर्षण-वर्षण बसता है, उसकी लय में चंचल बूँदों का भीगा तन-मन बसता है, उसकी लय में शोख़ बिजली की छमक-दमक कड़कती है, उसकी लय में जीवन-विभव की उष्मा-सुषमा ठहरती है, उसकी लय में सुघड़ दामन की लहक-दहक दमकती है!  ⁃ सतीश  2 जनवरी, 2019/ अप्रैल 2024/ 28 जून 2024

वक्ष

वक्ष मन-तन की पुलक की ऊभ-चुभ,  उथल-पुथल को सगर्व सँभाले, नेह से भरे वक्ष उठे, जगे हैं, - प्रकृति की संकलित आभा से निखरे, सुंदर, सुरभित, अपरिमित, निष्कलुष, निराले!  सम्पूर्ण वलय में लय है जीवन-सौंदर्य के मोहक दर्शन!  -सतीश  अगस्त 3/10, 2024

कोई बात थी जो

कोई बात थी जो  चाय में ढुलक गई, मन से फिसल गई, मिल गई, घुल गई, सरल-तरल हो गई, अपने आप को खोती हुई, अपने आप को पाती हुई !  सहज पेय हो गई, यादों में रिस कर  जीवन भर के लिए गेय हो गई।  कोई बात थी जो!  सतीश  अगस्त 19, 2024. 

चाँदनी

चाँदनी  चाँदनी वो सरक गई, न जाने कैसे लहक गई, मन के भीतर कुछ बहक गई, दूर-दूर तक फैल गई,- कोर-कोर में, पोर-पोर में, रग-रेशों में! स्वच्छ ऊर्मियाँ छहर गईं, तबीयत के कोने-कोने में फहर गईं!  ⁃ सतीश  अगस्त 24, 2024. 

चाँद क्यों पूर्ण हुआ ?

 चाँद क्यों पूर्ण हुआ ? ये चाँद क्यों पूर्ण हुआ?  अतिशय शीत रहकर भी,  दागों से भरे होकर भी  धरती के पास रहने की उत्कंठा में, अग-जग को सह्रदय निहार लेने की उत्सुकता में मन ही मन लहकता गया,  चाँद निरंतर उजलता गया!  यों वह पूर्ण हुआ, सम्पूर्ण हुआ!  -सतीश  अगस्त 19,  2024.  (सावन-पूर्णिमा) 

बादल और सूरज

बादल और सूरज  पूरब-क्षितिज पर बादल - बड़े हों या छोटे उजले-गोरे हों या काले - कभी अकेले,कभी गिरोह में  आकुल-व्याकुल होकर  सूरज को ढँकने में लगे हैं!  रिक्त-अतिरिक्त चिंता-पीड़ा से मुक्त  सूर्य एकनिष्ठ,एकधुन हो  हर पल उजलने में लगा है!  यह है जीवन की नैसर्गिक विधा?  या प्रकृति-तत्वों की अपनी-अपनी नीयत? अपनी-अपनी नियति? ⁃ सतीश  अगस्त 11, 2024. 

सागर-शरीर

सागर-शरीर  सागर, तेरे शरीर पर हमने  तरल भावों को सहज सरकते देखा; सागर, तेरी लहरों में हमने  जीवन को उठते-गिरते देखा; सागर, तेरी छाती में हमने  उन्मादी साँसों को मदमाते देखा; सागर, तेरे वक्ष-पटल पर हमने शून्य को कुछ ऊभ-चुभ करते देखा; सागर, तेरी नील-नील छवि में हमने  सौंदर्य को समाधि लेते देखा; सागर, तेरे  अन्तर्मन में हमने  वर्षों-सदियों-कल्पों को बोलते-सुनते देखा; सागर, तेरे गर्जन-तर्जन  में उत्सुकता, उम्मीदों, मूड-मिज़ाजों को हहराते देखा; सागर, तेरे  तट पर हमने जीवन-रेतों को तन-मन से भीगा देखा; सूखी-भूखी सत्ता को चाहे-अनचाहे कुछ विभोर होते, कुछ डूबते देखा!  -सतीश  अगस्त 24/25, 2024. 

सागर का जीवन

 सागर का जीवन  ऐ सागर, तेरा विस्तार!  तेरे अस्तित्व के तार-तार, हम कह लें इसे गति का नैसर्गिक शील या जड़ता!  अनगिनत लहरें तेरी छाती पर लोटती रहीं,  लोग पहेलियों की तरह आये और चले गये,  सदियाँ सामने से गुज़र गईं,  कई बार समय की ज़ुबानी थम सी गई,  बहुत बार साँसों की कहानी सचेतन हो गई, शहर भाग-दौड़ में अब भी व्यस्त है, घाटियाँ लहलहा रही हैं, उसके तन-मन पर हरे-भरे पेड़ सवाक् उठे हैं!  पर, महासमुद्र, तुम इतने चुप क्यों हो?  तेरा मन इतना अचंचल कैसे है?  किस स्मृति में तुम खोये हो?  कौन-सा रहस्य मन में धारे हो?  असीमित रूप से फैल कर भी  शून्यता को बूझने में लीन हो?  यही जीवन है?  यही जीवन है!  -सतीश  अगस्त 24, 2024. 

ग़ुलामी, चाहे-अनचाहे!

          ग़ुलामी, चाहे-अनचाहे!            ग़ुलामी के गुल बड़े मोहक होते हैं,   हम में से कुछ उनके “सुवास” में  बँधे होते हैं, बँधे रहना चाहते हैं,- आमूल, अनवरत, आजीवन!  ग़ुलामी के वृक्ष बड़े ऊँचे होते हैं,   विविध प्रकार, आकार, विस्तार के, बड़ी- बड़ी छाया वाले,बड़े-बड़े फल वाले, विशद जड़ वाले, गहरी जड़ता वाले; वे धरती को पकड़े रहना जानते हैं, आसमान की ओर उचकना भी जानते हैं; उनकी भंगिमाएँ, उनकी छवियाँ, शिक्षा-परीक्षा-मनोभावनाएँ,  अद्भुत कामनाएँ, ‘मनोहारी’ कुंठाएँ दूर-दूर तक हमें जकड़ती हैं-  चाहे-अनचाहे, समय-असमय!         सतीश  Oct 26, 2021. 

देश का रक्षा-बंधन

 देश का रक्षा-बंधन वो भी किसी की बहन होगी, वो भी किसी की बेटी होगी, पर, सभ्यता का तट वह पा न सकी, संस्कृति का शील देख नहीं सकी! स्वतंत्रता के पचहत्तर से अधिक वर्षों के बाद भी व्यवस्था की वर्तिका सही-सही जलती नहीं,  उसकी चरित्र-कथा ठीक से उजलती नहीं, बड़े, शोख़ वादों, दावों के बीच पैसे, पहुँच, पैरवी के रोर-शोर में,  नीचे-से-नीचे जाने की होड़ में  यंत्र-तंत्र की व्यवहार-संहिता बदलती नहीं!  तब राष्ट्र रक्षा के सुंदर बंध कैसे बनायेगा? मुक्ति के पट कैसे फैलायेगा?  अराजकताओं के अंहकारों, आलापों,  विलापों को कैसे थामेगा?  वह अपने आप को सुरक्षा-कवच कैसे पहनायेगा?  रक्षा-प्रतिरक्षा के सूत्र कैसे गढ़ेगा?  ⁃ सतीश  अगस्त 18/19, 2024, रक्षा-बंधन। 

मुख्यमंत्री प्रदर्शन पर हैं!

मुख्यमंत्री प्रदर्शन पर हैं!  समाचार ने बताया कि  अपने ही राज्य में  बलात्कार के विरूद्ध “मुख्यमंत्री” प्रदर्शन पर हैं!  यह “सम-आचार”  है  या व्यवस्था का विषम आचार? या एक सुनियोजित व्यभिचार?  या मान-मानकों के वधिकों का कुत्सित संस्कार?  या क्रियाहीनता का वीभत्स चरित्र?  या कार्यपालिका की कर्म-विहीन अश्लीलता?  कहते हैं इसे  प्रजातंत्र के बेचैन ह्रदय की अनोखी ममता?  या प्रजातंत्र का अद्भुत जंतर-मंतर? या जंतर-मंतर का शांतिप्रिय दर्शन ? !  या मर्यादा-मही का महाभंजन?  दूसरे प्रदेश के निष्ठावान नेता ने अपनी निष्ठा-विष्ठा को मन से उलीच दिया  और ज़ोर देकर जताया कि  मुख्यमंत्री “महिला” हैं, वह “संवेदनशील” हैं!  सचमुच, प्रजातंत्र की आत्मा सात्विकता से हिल गई,  “बंग-भंग” पर पूरी-पूरी ममतामयी हो गई,  एक “समाजी”, एक “वादी” की “संवेदना” के  “शील” के धर्म से निरपेक्ष स्पंदन से!  फिर खबर आई कि  बलात्कार के घटना-स्थल पर पेशाबघर बना दिये गये!  प्रजातंत्र ने यों मर्यादित होकर  अपने मल-मू...

बलिदान-कथा

बलिदान - कथा    - - -  भारत   माँ   के   जीवन   हेतु जिसने   अपने   जीवन   को   वार   दिया , अपनी   बचपना , जवानी , अपनी   कहानी , अपना   परिवार , सारे   सुख - संबंधों ,  नेह - बंधों , नाते - रिश्तों   को   भूलकर   जिसने   माँ   की   वेदी   को   अपने   कर्म - आसक्त   रक्त   से   सींच   दिया  ! - यह   उन   महाधन्य   संतानों   की   गाथा   है !  मन   के   तारों   में   आसमान   की   स्वच्छ   नील   छवि , रग - रग   में   मिट्टी   की   स्मृति   का   अमिय   बोध   लिये , कृतज्ञता   से   सिक्त   मन   के   सीधे   भाव   लिये   यह   हमारे   पूर्वजों   के   बलिदानों   की   विनीत   मर्म - कथा   है !  सतीश   August 15, 2023. 

चाँद का टुकड़ा कैसा होगा? ( भाग - २)

चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?  ( भाग - २) चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?  मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं वह संत-स्वभाव, कहीं कहीं वह मद में होगा! कहीं-कहीं मोह से लिपटा, कहीं-कहीं वह त्यागी होगा!     चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?     मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं रोता होगा, कहीं-कहीं वह गाता होगा!  कहीं-कहीं नींद में भूला, कहीं-कहीं वह जगा होगा!    चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?     मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं भीगा-गीला, कहीं-कहीं वह सूखा होगा!  कहीं-कहीं वह सीधा-साधा, कहीं-कहीं मादक होगा!     चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?     मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं हेमंत और शीत, कहीं-कहीं वसंत और ग्रीष्म, कहीं-कहीं वह सावन होगा,  सम्पूर्ण, सिक्त मनभावन होगा!  कहीं-कहीं धर्म-अधर्म, कहीं-कहीं कला-अकला, कहीं-कहीं कविता-कहानी,  कहीं-कहीं सकल जीवन होगा!          चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?          मन के जैसा-जैसा होगा!...

चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?

चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?  चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?  मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं वह कटा-कटा, कहीं-कहीं वो पूरा होगा!  कहीं-कहीं तपता होगा, कहीं-कहीं वो शीतल होगा!         चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?         मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं कठिन-कठोर, कहीं-कहीं वह कोमल होगा!  कहीं कहीं सहज-सरल, कहीं-कहीं वो विरल होगा!          चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?          मन के जैसा-जैसा होगा!  कहीं-कहीं खिला-खिला, कहीं-कहीं वह खोया होगा; कहीं-कहीं योग में डूबा, कहीं-कहीं वो भोगी होगा!        चाँद का टुकड़ा कैसा होगा?         मन के जैसा-जैसा होगा!  - सतीश  अगस्त 8, 2024. 

मित्रता

मित्रता   सच्ची   मित्रता   है   एक   महान्   वरदान , भूल - चूक   से   परे   जीवन   का   सुंदर   मान !  स्मृति   की   अनजानी   लड़ियों   को   पाकर   उघड़ - उघड़   कर   वह   खिलखिला   उठती , बातों   से   बातों   की   तरंगों   पर   चढ़कर   न   जाने   कैसे - कैसे ,  कहाँ - कहाँ   बहक   जाती ,  अनगिनत   खुले   भावों   के   संवेगों   को   पाकर   वो   मन   के   कोने - कोने   में   है   लहक   जाती !  - सतीश   जून  9, 2024. 

वल्लरी

वल्लरी कितनी सहज होती है वल्लरी!  लिपट जाती है औरों से भी, तन से, मन से, जीवन से, जीवन-भर!  सुबह हो या शाम उसे अंतर नहीं आता, वह स्वयं से बात करती रहती है, दूसरों के संग रहकर भी साँसों को साँसों से सुलगाती  अपनी धुन में रहती है!  वह पुस्तकों में, वादों, विवादों में, तर्कों, अंकों, आँकड़ो की रेतीली छवियों में अपने आप को खोती नहीं, हर क्षण जीवन को ढूँढने में लगी रहती है; कभी किसी कोने में, कभी बहुतों  के बीच, कभी फूलों के साथ, कभी काँटों के संग  जीवन के प्रसंगों को खोजती, जीने में जुटी रहती है !  ये वल्लरी!  -सतीश  अगस्त 1, 2024.